KARAN
KARAN
Ghazal

दिलो-जाँ की 'फ़ज़ीहत है मोहब्बत, मान भी जाओ

अज़ीयत बस अज़ीयत है मोहब्बत, मान भी जाओ

बहुत मोहतात तुम रहना, रहे-उल्फ़त में दीवानो
मुजस्सम, इक क़यामत है मोहब्बत, मान भी जाओ

कोई दिन थे, हुआ करती थी शहज़ादी ये ख़्वाबों की
मगर अब सिर्फ़ ज़िल्लत है मोहब्बत, मान भी जाओ

नफ़ा'-नुक़सान तकते हैं, "वफ़ा अब कौन करता है
अजी! सच है "तिजारत है मोहब्बत, मान भी जाओ

कहानी 'क़ैसो-कोहकन की, ज़रा इक बार पढ़ लेना
बड़ी ग़मनाक 'इबरत है मोहब्बत, मान भी जाओ

मसर्रत कह रहे हो तुम, मगर हम जानते हैं दोस्त
ग़मे-जाँ की, 'वज़ाहत है मोहब्बत, मान भी जाओ

यही मिसरा लिखा देना, करन की लौहे-तुर्बत पर
बड़ी 'रंगीन वहशत है मोहब्बत, मान भी जाओ

— KARAN

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