KARAN
KARAN
Ghazal

वस्ल की शाम अधूरी भी हो सकती है

और मुसलसल दूरी भी हो सकती है

मत रहना इस वहम में हर्गिज़ दीवानों
रोज़, तमन्ना पूरी भी हो सकती है

बिरहन-सी जो रात है, उतरी आँगन में
तुम आओ, सिंदूरी भी हो सकती है

तुम अंदाज़ लगाते रहना चाहत के
नूर में इक बे-नूरी भी हो सकती है

आज मसाइल इश्क़ में बढ़ते जाते हैं
शायद, उन से दूरी भी हो सकती है

इश्क़ महकता है, चंदन हो सकता है
साँसों में कस्तूरी भी हो सकती है

दीवाने हैं, दीवानों को दुनिया क्या
धड़कन, ग़ैर-ज़रूरी भी हो सकती है

इश्क़ है यारो, इश्क़ में हों बदनाम अगर
रुस्वाई, मशहूरी भी हो सकती है

आज मुहब्बत, शेवा है उस का लेकिन
कल कोई, मजबूरी भी हो सकती है

खोट करन कुछ तेरे इश्क़ में भी होगा
कुछ उस की मगरूरी भी हो सकती है

— KARAN

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