KARAN
KARAN
Ghazal

वरक़ चाहतों के हवा ले गई

मुहब्बत की सारी अदा ले गई

जिधर देखिए बे-वफ़ा बे-वफ़ा
सदी पिछली रस्मे-वफ़ा ले गई

न मालूम था तेरे घर का पता
हमें तेरे दर तक दुआ ले गई

हुआ दौर बर्बादियों का शुरू
तेरी इक नज़र दिल चुरा ले गई

तबस्सुम ने लूटा मेरा चैन कुछ
तो कुछ तेरी शर्मो-हया ले गई

मुहब्बत का हासिल ये आवारगी
हमें दर-ब-दर जा-ब-जा ले गई

बड़ी मुश्किलों से बना आशियाँ
इक आँधी सितम की उड़ा ले गई

करन इक उदासी मिली राह में
हमारे ही घर का पता ले गई

— KARAN

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