दिल को यूँँ समझा लेता हूँ
ग़ज़लें गाने गा लेता हूँ
ऊँचे सुर भी भाते मुझ को
धीरे से भी गा लेता हूँ
अपने मन को बहलाने को
सबका मन बहला लेता हूँ
एक बुरी आदत है मेरी
मैं सब को अपना लेता हूँ
शा'इर भी हूँ आशिक़ भी हूँ
हर झगड़ा सुलझा लेता हूँ
आशिक़ बढ़ते है बस्ती में
जब उस को बुलवा लेता हूँ
तुम जो समझो मेरा क्या है
मैं उस को समझा लेता हूँ
— Aashish kargeti 'Kash'















