ये हम ने याद रक्खा जो हमें वो भूल जाना था
सिसकने की जगह पर भी ख़ुशी से फूल जाना था
पड़ा जब गाल पर थप्पड़ समझ में मेरी आया तब
क़सम से यार बचपन में हमें स्कूल जाना था
लगाते कुछ पता आख़िर हमारे पास ही आते
हमारे पास आना भी उन्हीं को भूल जाना था
तिरी ग़ज़लों ने बोला जब बताया 'कश' ज़ुबानी ये
तिरी क़िस्मत में आख़िर में ज़माना भूल जाना था
— Aashish kargeti 'Kash'















