मैं चाहता हूँ अब तेरे नाम ज़िंदगी हो
मैं चाहता हूँ मेरे हाथों में हथकड़ी हो
क़ातिल निगाह ये साड़ी कान पे ये झुमका
इस पे भी हाए जब तुम ज़ुल्फ़ें सँवारती हो
मैं ने छिपा रखा है सब से तुम्हें तो जानाँ
तुम मेरी डाइरी का वो पेज आख़िरी हो
यूँ खाती है मिरा सर वो कहना पड़ता है फिर
चुप भी करो मेरी माँ तुम कितना बोलती हो
हर एक ज़ख़्म की उस के पास तो दवा है
बस एक शर्त ये है वो ज़ख़्म बाहरी हो
इक ये भरम रखा है हँसते हुए लबों ने
ये लोग पूछते है सच में उदास भी हो
तुम से बिछड़ के फिर मैं भी हो गया किसी का
इक अजनबी को और तुम भी जान बोलती हो
मैं ने जिसे भी चाहा है टूट कर है चाहा
ऐसा नहीं कि बस तुम ही मेरी ज़िंदगी हो















