main chahta hooñ ab tere naam zindagi ho | मैं चाहता हूँ अब तेरे नाम ज़िंदगी हो

  - Kartik tripathi

मैं चाहता हूँ अब तेरे नाम ज़िंदगी हो
मैं चाहता हूँ मेरे हाथों में हथकड़ी हो

क़ातिल निगाह ये साड़ी कान पे ये झुमका
इस पे भी हाए जब तुम ज़ुल्फ़ें सँवारती हो

मैं ने छिपा रखा है सब सेे तुम्हें तो जानाँ
तुम मेरी डायरी का वो पेज आख़िरी हो

यूँँ खाती है मिरा सर वो कहना पड़ता है फिर
चुप भी करो मेरी माँ तुम कितना बोलती हो

हर एक ज़ख़्म की उसके पास तो दवा है
बस एक शर्त ये है वो ज़ख़्म बाहरी हो

इक ये भरम रखा है हँसते हुए लबों ने
ये लोग पूछते है सच में उदास भी हो

तुम सेे बिछड़ के फिर मैं भी हो गया किसी का
इक अजनबी को और तुम भी जान बोलती हो

मैंने जिसे भी चाहा है टूट कर है चाहा
ऐसा नहीं कि बस तुम ही मेरी ज़िंदगी हो

  - Kartik tripathi

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