Adnan Ali SHAGAF

Adnan Ali SHAGAF

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Adnan Ali SHAGAF shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adnan Ali SHAGAF's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ऐ जानेमन इस को फ़क़त तोहफ़ा न समझो टेड्डी बियर में दिल छुपा कर दे रहे हैं — Adnan Ali SHAGAF
रिज़र्वेशन मिलेगा इश्क़ में क्या मैं अपनी शक्ल से पिछड़ा हुआ हूँ — Adnan Ali SHAGAF
अच्छा तो इश्क़ करना तुम ही हमें सिखा दो जैसा कि तुम कहोगे बस हू-ब-हू करेंगे — Adnan Ali SHAGAF
सीने में तो काँटे ही नहीं हैं दिल में फिर ये चुभन क्यूँ है माना कि ख़ुदा है साथ मेरे फिर भी ये अकेलापन क्यूँ है — Adnan Ali SHAGAF
जब कभी ज़ख़्म तेरे भरने लगें याद करना मुझे अकेले में — Adnan Ali SHAGAF
तेरे बा'द इस क़दर मैं रोया हूँ लोग मुझ को नदी बुलाते हैं — Adnan Ali SHAGAF
हक़ीक़त में नहीं हूँ ख़ूबरू उतना मगर तस्वीर में अच्छा लगूँगा मैं — Adnan Ali SHAGAF
ख़ुदा के दर से तुझे इस अदा से माँगा है कि हाथ उठा के नहीं सर झुका के माँगा है — Adnan Ali SHAGAF
कुछ कर नहीं रहे तो इक काम कीजिएगा बाँहों में आके मेरे आराम कीजिएगा — Adnan Ali SHAGAF

Ghazal

है उस सेे दोस्ती पर दिल-लगी के ख़्वाब बुनता हूँ मैं इक सहरा में आ कर जलपरी के ख़्वाब बुनता हूँ ये कुर्सी मेज़ है और कुछ किताबों का ज़ख़ीरा है यहीं पे बैठ कर मैं नौकरी के ख़्वाब बुनता हूँ मेरी तृष्णा मिटाने को मेरे आँसू ही काफ़ी हैं कुएँ पे बैठ कर बस ख़ुद-कुशी के ख़्वाब बुनता हूँ हमारे दरमियाँ कुछ है ये तेरी बद-गुमानी है मैं बस उन औरतों से दोस्ती के ख़्वाब बुनता हूँ मुझे मेरे ग़मों का इस्तेआरा भी नहीं मिलता सो ख़ुद में गुम हूँ और दीवानगी के ख़्वाब बुनता हूँ उसे जिस को मेरी मौजूदगी पल‌ भर नहीं भाती उसी के साथ अपनी ज़िन्दगी के ख़्वाब बुनता हूँ दिया रौशन हो चाहे जिस के भी हाथों पे हो रौशन मैं जुगनू की तरह बस पैरवी के ख़्वाब बुनता हूँ — Adnan Ali SHAGAF
दिल अगर सूरत-ए-इंसान में आ जाएगा थक के फिर ज़ीस्त से ज़िनदान में आ जाएगा दिल-ए-दरवेश तेरी चाह में फिरता जो रहा आँख मिलते ही तेरे ध्यान में आ जाएगा रब की नेमत में बहुत ख़ास है बंदे की वफ़ा जिस को ठुकरा के तू नुक़सान में आ जाएगा यूँँ तो बातों में कोई वज़न नहीं है उस के ये अलग बात कि औज़ान में आ जाएगा एक लाठी तुझे दी और ये निशानी मूसा हाथ खोलेगा तो पहचान में आ जाएगा तूर होते हुए ज़ैतून से वो होगा नमूद फिर ख़ुदावन्द यूँँ फ़ारान में आ जाएगा इक अजूबा है तेरी तर्ज़-ए-मसीहाई शगफ़ शे'र फूकेगा तो वो जान में आ जाएगा — Adnan Ali SHAGAF
तुझ को पाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं पास आने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं आप मैं दोस्त हैं इतना ही मुझे काफ़ी है दिल लगाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं कि तेरे दर को फ़क़त दूर से तकता जाऊँ घर में आने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं बैठ कुछ बात करें बात सुनें शाम ढले नाच गाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं यूँँ करें मुझ को मोहब्बत ही अता कर दें आप ज़हर खाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं आप के तंज़ से कुछ सीख ही मिल जाती है डाँट खाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं मैं कि उस्तादों के उस्तादों का उस्ताद 'शगफ़' हाँ जताने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं — Adnan Ali SHAGAF
ये कौन है जो ख़्वाब में मुझे सिखा रही ग़ज़ल मुझे नहीं पता कहाँ कहाँ से आ रही ग़ज़ल जफ़ा समेटते हुए मैं जब कभी बिखर गया तो हर्फ़ हर्फ़ जोड़कर मुझे बना रही ग़ज़ल सुनो तुम्हारी बातों में नशा नशा सा लग रहा तुम्हारे इन लबों पे जैसे मुस्कुरा रही ग़ज़ल कहाँ चली मता-ए-जाँ कि रुक ज़रा सा सब्र कर ये तेरी ख़ूबियाँ ही तो तुझे बता रही ग़ज़ल ये पहले हम ही शाइरों के रास्तों पे चल पड़ी पर अब ये अपनी राह ख़ुद हमें चला रही ग़ज़ल ज़बान की जहान में ये रेख़्ता सितारे हैं फिर इन सितारों के जहाँ में जगमगा रही ग़ज़ल बड़ी ही पुर कशिश सदा रवाँ है उस सेे जा-बजा कि "लहजा-ए-शगफ़" में जब वो गुनगुना रही ग़ज़ल — Adnan Ali SHAGAF

Nazm

"ज़िन्दगी" ज़िंदगी जैसे कि सहराओं में बैठी लड़की ज़िंदगी जैसे कि अख़्नोख़ की लिक्खी चिट्ठी ज़िंदगी जैसे कोई सहन-ए-सुलैमानी है ज़िंदगी बस तेरी यादों की फ़रावानी है ज़िंदगी ख़ुद के तमाशे का तमाशाई है ज़िंदगी आँख के परदे पे उतर आई है किसलिए तोहमतें बाँधूँ की ये रा'नाई है ज़िंदगी है तो मेरी जान में जान आई है ज़िंदगी है किसी भूखे पे निवाले रखना ज़िंदगी दिल के उजाले को सँभाले रखना ज़िंदगी बस किसी वादे से मुकर जाना है ज़िंदगी चुपके से गलियों से गुज़र जाना है ज़िंदगी चाँदनी की हल्की सी बीनाई में ज़िंदगी मौसमों की आलसी अँगड़ाई में ज़िंदगी शोर दबाती हुई शहनाई में ज़िंदगी ख़ुद में दबे ख़ौफ़ व रुसवाई में ज़िंदगी घर से निकलती हुई परछाई में चुपके चुपके तुझे आवाज़ लगाते रहना ज़िंदगी या तो तेरे पीछे ही आते रहना ज़िंदगी बस तेरी ज़ुल्फ़ों को सजाते रहना ज़िंदगी ज़ुल्फ़ों के साए में टहलना फिरना पेच-ओ-ख़म से भरी लहरों में उभरना गिरना फिर इन्हें ग़ैर निगाहों से हटाके रखना या'नी सायों को भी साए से बचा के रखना ज़िंदगी है किसी हीरे को छुपाके रखना ज़िंदगी अशरफ़-ओ-अलज़ाफ़ की जागीर नहीं ज़िंदगी सिर्फ़ गुलाबों की तसावीर नहीं ज़िंदगी ख़ुद की ग़ज़ल ख़ुद से रक़म करती ज़िंदगी शा'इरी है पर सुख़न-ए-मीर नहीं ज़िंदगी एक खुला तीर है शमशीर नहीं ज़िंदगी नज़्म है पर ताक़त-ए-तहरीर नहीं ज़िंदगी गीत है और गीत को गाते रहना लम्हा दर लम्हा इसे फ़न में गँवाते रहना ज़िंदगी फल है जिसे रोज़ पकाते रहना ज़िंदगी आप में रंगीन अदाकारी है ज़िंदगी मौत से बस लड़ने की बीमारी है — Adnan Ali SHAGAF
"मु'आइना" आज बैठा नहीं है कोई उस के दर पे, जनाब! आज मौजूद है ही नहीं क्या कोई उस के घर पे, जनाब? छत की रेलिंग पे हैं कुछ तो कपड़े पड़े गो हों महबूब के पर वहाँ पर भी मौजूदगी का नहीं कुछ गुमाँ होगी शायद वो कमरे में लेटे पड़े बिस्तरे पर ही आराम से इक अजब सी ख़मोशी भरी ये फ़ज़ा और रंगत बदलता हुआ आसमाँ मुझ को मालूम है ये है उस की ख़ता उस ने सूरज से पर्दा किया कहने को इक ज़रा भी नहीं चल रही है हवा और कपड़े वहीं के वहीं पर हैं लटके हुए जैसे मेरे मुक़द्दर का ताला है लटका हुआ और अफ़सुर्दगी को फ़ज़ा में बिखेरे ये सूरज भी ढल ही गया सर के ऊपर गुज़रते अचानक कोई पंछी चहकाई है छत पे देखा तो मुमकिन है वो ही नज़र आई हो और इसी वसवसे में बहुत धीरे-धीरे से इस तीरगी के वजह से मेरे आँखों से अब बिछड़ती ये बीनाई है दो ही इमकान हैं छत पे वो आई हो या वही आई हो फिर भी ऐन-ए-यक़ीं से उसे अब तलक मैं ने देखा नहीं क्या अजब है कि मग़रिब है और वो अभी तक है सोई हुई सब्र करना है तो सब्र ही करता हूँ अब मैं चलता हूँ मरने कि उठकर फिर उस के लिए मर सकूँ अब मैं चलता हूँ उस पर सलामुन 'अलैक — Adnan Ali SHAGAF