दिल अगर सूरत-ए-इंसान में आ जाएगा
थक के फिर ज़ीस्त से ज़िनदान में आ जाएगा
दिल-ए-दरवेश तेरी चाह में फिरता जो रहा
आँख मिलते ही तेरे ध्यान में आ जाएगा
रब की नेमत में बहुत खास है बंदे की वफ़ा
जिस को ठुकरा के तू नुक़सान में आ जाएगा
यूँँ तो बातों में कोई वज़न नहीं है उसके
ये अलग बात कि औज़ान में आ जाएगा
एक लाठी तुझे दी और ये निशानी मूसा
हाथ खोलेगा तो पहचान में आ जाएगा
तूर होते हुए ज़ैतून से वो होगा नमूद
फिर ख़ुदावन्द यूँँ फ़ारान में आ जाएगा
इक अजूबा है तेरी तर्ज़-ए-मसीहाई शगफ़
शे'र फूकेगा तो वो जान में आ जाएगा
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