दिल अगर सूरत-ए-इंसान में आ जाएगा

थक के फिर ज़ीस्त से ज़िनदान में आ जाएगा

दिल-ए-दरवेश तेरी चाह में फिरता जो रहा
आँख मिलते ही तेरे ध्यान में आ जाएगा

रब की नेमत में बहुत ख़ास है बंदे की वफ़ा
जिस को ठुकरा के तू नुक़सान में आ जाएगा

यूँ तो बातों में कोई वज़न नहीं है उस के
ये अलग बात कि औज़ान में आ जाएगा

एक लाठी तुझे दी और ये निशानी मूसा
हाथ खोलेगा तो पहचान में आ जाएगा

तूर होते हुए ज़ैतून से वो होगा नमूद
फिर ख़ुदावन्द यूँ फ़ारान में आ जाएगा

इक अजूबा है तेरी तर्ज़-ए-मसीहाई शगफ़
शे'र फूकेगा तो वो जान में आ जाएगा

— Adnan Ali SHAGAF

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