सोचता हूँ अगर समाज न हो

फिर मुहब्बत में शर्म लाज न हो

प्यार के बाँटने में हो मुश्किल
इतनी कसरत से इज़दिवाज न हो

ख़ुद से की थी ख़राब हालत तो
ख़ुद से क्योंकर मेरा इलाज न हो

आने वालों को दीजिए रस्ता
जाने वालों पे एहतिजाज न हो

दूसरी बार गर मिलें हम फिर
चाहतों का कोई रिवाज न हो

मान लेता हूँ हिज्र क़िस्मत है
जब भी होना हो पर ये आज न हो

जो भी आए तो उस का सर चू
में
कोई इतना भी ख़ुश-मिज़ाज न हो

— Adnan Ali SHAGAF

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