सोचता हूँ अगर समाज न हो
फिर मुहब्बत में शर्म लाज न हो
प्यार के बाँटने में हो मुश्किल
इतनी कसरत से इज़दिवाज न हो
ख़ुद से की थी ख़राब हालत तो
ख़ुद से क्योंकर मेरा इलाज न हो
आने वालों को दीजिए रस्ता
जाने वालों पे एहतिजाज न हो
दूसरी बार गर मिलें हम फिर
चाहतों का कोई रिवाज न हो
मान लेता हूँ हिज्र क़िस्मत है
जब भी होना हो पर ये आज न हो
जो भी आए तो उसका सर चू
में
कोई इतना भी ख़ुश-मिज़ाज न हो
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