कि हालत पे अपने नदामत नहीं की
ख़ुदा से कभी भी शिकायत नहीं की
वो ज़ालिम तो मेरा ख़ुदा हो गया था
मगर उस ख़ुदा की इबादत नहीं की
मेरी हरकतों से हो रुस्वाई तेरी
मियाँ मैं ने ऐसी हिमाक़त नहीं की
तुम्हें हुस्न पर उस के क्यूँ दस्तरस हो
जो दस्त-ए-सबा की हिफ़ाज़त नहीं की
अगर पाना ही है मुहब्बत तो मैं ने
अभी तक किसी से मुहब्बत नहीं की
— Adnan Ali SHAGAF















