मैं तो कहता था बस सँभल जाओ
यूँ नहीं था कि तुम बदल जाओ
मोम हाथों में ले के बैठा हूँ
अब भी मौक़ा है तुम पिघल जाओ
हाथ की नब्ज़ काट बैठा हूँ
ख़ूँ के ज़रिए ही तुम निकल जाओ
मेरी आँखों को आइना समझो
और इन
में ही आके ढल जाओ
अब ये आलम भी टलने वाला है
अब शगफ़ तुम भी याँ से टल जाओ
— Adnan Ali SHAGAF















