है उस सेे दोस्ती पर दिल-लगी के ख़्वाब बुनता हूँ

मैं इक सहरा में आ कर जलपरी के ख़्वाब बुनता हूँ

ये कुर्सी मेज़ है और कुछ किताबों का ज़ख़ीरा है
यहीं पे बैठ कर मैं नौकरी के ख़्वाब बुनता हूँ

मेरी तृष्णा मिटाने को मेरे आँसू ही काफ़ी हैं
कुएँ पे बैठ कर बस ख़ुद-कुशी के ख़्वाब बुनता हूँ

हमारे दरमियाँ कुछ है ये तेरी बद-गुमानी है
मैं बस उन औरतों से दोस्ती के ख़्वाब बुनता हूँ

मुझे मेरे ग़मों का इस्तेआरा भी नहीं मिलता
सो ख़ुद में गुम हूँ और दीवानगी के ख़्वाब बुनता हूँ

उसे जिस को मेरी मौजूदगी पल‌ भर नहीं भाती
उसी के साथ अपनी ज़िन्दगी के ख़्वाब बुनता हूँ

दिया रौशन हो चाहे जिस के भी हाथों पे हो रौशन
मैं जुगनू की तरह बस पैरवी के ख़्वाब बुनता हूँ

— Adnan Ali SHAGAF

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