है उससे दोस्ती पर दिल्लगी के ख़्वाब बुनता हूँ
मैं इक सहरा में आकर जलपरी के ख़्वाब बुनता हूँ
ये कुर्सी मेज़ है और कुछ किताबों का ज़ख़ीरा है
यहीं पे बैठकर मैं नौकरी के ख़्वाब बुनता हूँ
मेरी तृष्णा मिटाने को मेरे आँसू ही काफ़ी हैं
कुएँ पे बैठकर बस ख़ुद-कुशी के ख़्वाब बुनता हूँ
हमारे दरमियाँ कुछ है ये तेरी बदगुमानी है
मैं बस उन औरतों से दोस्ती के ख़्वाब बुनता हूँ
मुझे मेरे ग़मों का इस्तेआरा भी नहीं मिलता
सो ख़ुद में गुम हूँ और दीवानगी के ख़्वाब बुनता हूँ
उसे जिसको मेरी मौजूदगी पल भर नहीं भाती
उसी के साथ अपनी ज़िन्दगी के ख़्वाब बुनता हूँ
दिया रौशन हो चाहे जिसके भी हाथों पे हो रौशन
मैं जुगनू की तरह बस पैरवी के ख़्वाब बुनता हूँ
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