कौन कहता है ये फ़साना है
ज़िन्दगी इक ग़ुलाम-ख़ाना है
ख़ुद से करनी है बे-वफ़ाई मुझे
ख़ुद से ख़ुद का ही दिल दुखाना है
तुम तो ठंडक हो मेरे आँखों की
तुम को दिल में नहीं बसाना है
ज़िन्दगी फिर ये बंदगी उस की
क़ैद-ख़ाने में क़ैद-ख़ाना है
दीन-ओ-दुनिया की बात कर के उसे
पागलों की तरह भुकाना है
उस के दिल तक रसाई लेने को
मुझ को बातों का पुल बनाना है
दिल मुहब्बत में क्यूँ न हो हस्सास
दिल तो अहसास का घराना है
— Adnan Ali SHAGAF















