सीने पर अपने खा के तेरा तीर चूमता
और फिर शहीद कर तुझे शमशीर चूमता
पा कर भी तुझ को ख़्वाब में चूमा नहीं कभी
शायद मैं तेरे ख़्वाब की ता'बीर चूमता
मरते हैं तुझ पे शाह तो ये और बात है
बनकर तेरा ग़ुलाम मैं ज़ंजीर चूमता
ख़ुद के लबों का ज़ाइक़ा मिल जाए गर उसे
दर्पन में अपनी हर घड़ी तस्वीर चूमता
रौनक़ कुछ और होती चमन की वो शख़्स अगर
खिलते हुए गुलाब को ताख़ीर चूमता
तू जिस को चाहती है उसे मुझ से तो मिला
मैं भी ज़रा जनाब की तक़दीर चूमता
अफ़सोस है 'शगफ़' को कोई चूमता नहीं
ऐसे मिज़ाज पर तो उसे मीर चूमता
— Adnan Ali SHAGAF















