"ज़िन्दगी"

ज़िंदगी जैसे कि सहराओं में बैठी लड़की
ज़िंदगी जैसे कि अख़्नोख़ की लिक्खी चिट्ठी
ज़िंदगी जैसे कोई सहन-ए-सुलैमानी है
ज़िंदगी बस तेरी यादों की फ़रावानी है
ज़िंदगी ख़ुद के तमाशे का तमाशाई है
ज़िंदगी आँख के परदे पे उतर आई है
किसलिए तोहमतें बाँधूँ की ये रा'नाई है
ज़िंदगी है तो मेरी जान में जान आई है
ज़िंदगी है किसी भूखे पे निवाले रखना
ज़िंदगी दिल के उजाले को सँभाले रखना
ज़िंदगी बस किसी वादे से मुकर जाना है
ज़िंदगी चुपके से गलियों से गुज़र जाना है

ज़िंदगी चाँदनी की हल्की सी बीनाई में
ज़िंदगी मौसमों की आलसी अँगड़ाई में
ज़िंदगी शोर दबाती हुई शहनाई में
ज़िंदगी ख़ुद में दबे ख़ौफ़ व रुसवाई में
ज़िंदगी घर से निकलती हुई परछाई में
चुपके चुपके तुझे आवाज़ लगाते रहना
ज़िंदगी या तो तेरे पीछे ही आते रहना

ज़िंदगी बस तेरी ज़ुल्फ़ों को सजाते रहना
ज़िंदगी ज़ुल्फ़ों के साए में टहलना फिरना
पेच-ओ-ख़म से भरी लहरों में उभरना गिरना
फिर इन्हें ग़ैर निगाहों से हटाके रखना
या'नी सायों को भी साए से बचा के रखना
ज़िंदगी है किसी हीरे को छुपाके रखना

ज़िंदगी अशरफ़-ओ-अलज़ाफ़ की जागीर नहीं
ज़िंदगी सिर्फ़ गुलाबों की तसावीर नहीं
ज़िंदगी ख़ुद की ग़ज़ल ख़ुद से रक़म करती
ज़िंदगी शा'इरी है पर सुख़न-ए-मीर नहीं
ज़िंदगी एक खुला तीर है शमशीर नहीं
ज़िंदगी नज़्म है पर ताक़त-ए-तहरीर नहीं

ज़िंदगी गीत है और गीत को गाते रहना
लम्हा दर लम्हा इसे फ़न में गँवाते रहना
ज़िंदगी फल है जिसे रोज़ पकाते रहना

ज़िंदगी आप में रंगीन अदाकारी है
ज़िंदगी मौत से बस लड़ने की बीमारी है

— Adnan Ali SHAGAF

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