ham mohabbat ke zamaane se nikal aa.e hain | हम मोहब्बत के ज़माने से निकल आए हैं

  - Khalid Azad

हम मोहब्बत के ज़माने से निकल आए हैं
दर्द के ऐसे ही ख़ाने से निकल आए हैं

क़ैस सँभला भी नहीं जा के जहाँ पे यक्सर
हम तो ऐसे भी ठिकाने से निकल आए हैं

तेरे ग़म ने, तो निकलने की इजाज़त कब दी
अश्क अब की तो, बहाने से निकल आए हैं

तीर छोड़ा था जो सय्याद ने चालाकी से
हम तो उसके भी निशाने से निकल आए हैं

आईना बन के कभी घर से जो बाहर निकला
संग अपने ही घराने से निकल आए हैं

जिसने हर बार यहाँ तर्क अहद कर डाला
फिर भी उसके ही बुलाने से निकल आए हैं

  - Khalid Azad

Protest Shayari

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