हुए उस से जुदा तो शा'इरी की
कोई जो ग़म मिला तो शा'इरी की
रफ़ूगर से गिला क्यूँकर करें हम
गिरेबाॅं ख़ुद सिला तो शा'इरी की
अदाकारी में थे मसरूफ़ यूँ तो
हुआ जो इक गिला तो शा'इरी की
पनाहो में था मुद्दत से मैं जिस की
हुआ जो वो ख़फ़ा तो शा'इरी की
न जाने होश में क्या बक रहा था
लगा चढ़ने नशा तो शा'इरी की
— Rohan Hamirpuriya















