मत पूछ कब और कैसे खुलेगा
ये राज़ इक दिन सब पे खुलेगा
शाइ'र नहीं ख़ुद ये जानता है
ये शे'र किस पे कैसे खुलेगा
हर बात पे क्यूँ चुप सा रहा हूँ
ये राज़ धीरे धीरे खुलेगा
मैं हो गया हूँ ख़ामोश इतना
जो हाल है वो सब पे खुलेगा
दरवाज़ा है जो क़िस्मत का 'रोहन'
जब भी खुलेगा ख़ुदस खुलेगा
— Rohan Hamirpuriya















