सोच रही है मेरे साथ वो चलते हुए
देख न ले कूचे से कोई निकलते हुए
आप ही बनना पड़ा अपना ही रहबर मुझे
'उम्र हुई दूजों के रस्तों पे चलते हुए
अपना हो या ग़ैर का चाहे किसी का हो घर
देखा नहीं जाता है घर कोई जलते हुए
याद नहीं आती है उसको मेरी अब मगर
देखे हैं पत्थर के दिल मैंने पिघलते हुए
दूर निकल आया वो तोड़ के सब बंदिशें
देखा है दौलत को यूँँ रिश्ते निगलते हुए
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