तुम को कम लगते हैं नगीने से
शे'र सींचे हैं ख़ूँ-पसीने से
सर्द मौसम है और मैं तन्हा हूँ
मुझ को नफ़रत है इस महीने से
मौजों की थी रवानी कुछ ऐसी
बाँध कर ले गई सफ़ीने से
जिस से बरसों से झगड़ा है अपना
तुम भी मिल आई उस कमीने से
तुम हो हक़दार मुझ से बेहतर के
उस ने छोड़ा भी तो क़रीने से
— Rohan Hamirpuriya















