उठ के तेरे क़रीब बैठ गया
मेरे होते रक़ीब बैठ गया
ग़म-गुसारी से उठ खड़ा हुआ मैं
हाल सुन के तबीब बैठ गया
ताज दौलत हुनर मक़ाम मिला
इश्क़ में पर नसीब बैठ गया
शख़्स जिस से गिला था अरसे से
मुस्कुरा कर क़रीब बैठ गया
इक नज़र देखा मैं ने उस को और
तख़्त-ए-दिल पर हबीब बैठ गया
जब सियासत ने अपना रुख़ बदला
ज़हर ख़ा कर ग़रीब बैठ गया
— Rohan Hamirpuriya















