Kohar
Kohar
Nazm

"दिन निकलता है, ढलता है"

दिन निकलता है , ढलता है
शाम आती है, रात होती है
एक वक़्त ऐसा आता है
फिर जब मैं अकेला पड़ जाता हूँ
तन्हा फिर एक नए दिन की आस में
कोई तो मुझे भी पूछे इस प्यास में

रात मुझे सोने नहीं देती
दिखाती डरवाने ख़्वाब है
नींद होने नहीं देती
मुझे रोने नहीं देती
देखू तेरे सिवा कोई ख़्वाब
नींद उसे पूरा होने नहीं देती
रात मुझे सोने नहीं देती

और फिर
दिन निकलता है, ढलता है
और बस हर रोज़ यूँंही चलता है

— Kohar

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