कैसे-कैसे मरहले हैं
आइने भी हँस पड़े हैं
रात भर आँखों में मेरी
जुगनुओं के घर रहे हैं
अब्र सारे आसमाँ के
मेरे बिस्तर पे पड़े हैं
अब तो दीवारें बची हैं
बाम कब के ढह गए हैं
मैं ने जब आँखें उठाई
सारे चेहरे गिर पड़े हैं
इतनी चुप क्यूँ है ख़ुदाई
क्या ख़ुदा भी थक गए हैं
ये क़फ़स मेरा नहीं है
इस के सारे दर खुले हैं
धूप ओढ़े सो रहे थे
शाम-ए-ग़म में जल बुझे हैं
— Lekhak Suyash















