तू गया दिल हुआ सज़ा-ए-जाँ

तू खुला हम पे बन बला-ए-जाँ

कुछ न हासिल हमें तिरे बारे
है मगर तू हमें मता-ए-जाँ

तेरी आमद से फूल खिलते थे
शहर ये अब है कर्बला-ए-जाँ

जो कभी ख़्वाब थे तिरे दम से
हो गए हैं वो मसअला-ए-जाँ

तू गया तब से शहर है बिखरा
ख़ाक में मिल गई अदा-ए-जाँ

वो जो तेरी गली से आती थी
वो हवा भी कि अब जलाए जाँ

जब तिरा ग़म निकालने बैठे
कुछ भी निकला नहीं सिवा-ए-जाँ

ये ख़ला हम में क्यूँ भरी तू ने
मौत क्यूँ दे गया ख़ुदा-ए-जाँ

हम जो चुप हैं तो ये भी जुरअत है
ताकि ज़िंदा रहे वफ़ा-ए-जाँ

सब ने सोचा कि इश्क़ हारा है
हम ने बोला कि है नफ़ा-ए-जाँ

प्यार में हार कुछ नहीं होती
प्यार होना ही है जज़ा-ए-जाँ

ज़ख़्म गहरे सही मगर 'लेखक'
जागती है कहीं दुआ-ए-जाँ

— Lekhak Suyash

More by Lekhak Suyash

Other ghazal from the same pen

See all from Lekhak Suyash →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling