नींद आती है जिस घड़ी साहब
शब गुज़र जाती है मेरी साहब
झूट कहना भी ठीक होता है
आदमी का कभी-कभी साहब
मैं सॅंभाले हुए हूँ सालों से
बाप की दी हुई घड़ी साहब
चोट यूँॅं तो बहुत पुरानी है
पर ये दुखती है आज भी साहब
काम सारा निकल गया हम से
अब हमारी किसे पड़ी साहब
सिर्फ़ अपने तलक रखेंगे हम
अपने आपस की दुश्मनी साहब
बाप मुफ़लिस था फिर भी उस ने मेरे
शौक़ पूरे किए सभी साहब
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















