तुम्हें जब पड़ेगी ज़रूरत हमारी
पता तब चलेगी मुहब्बत हमारी
जिन्हें भी मुयस्सर हो ग़म ख़्वार अपना
समझ क्या सकेंगे वो हालत हमारी
कहा जब मुझे आप अपना बना लो
लगाने लगे लोग क़ीमत हमारी
चराग़ों में अब रौशनी आ गई है
तभी हो रही इतनी ख़िदमत हमारी
तुम्हारे तसव्वुर में जो आ रही है
रक़ीबों कभी थी वो चाहत हमारी
रहेगा यही रंज 'माहिर' हमेसा
हमें मिल न पाई मुहब्बत हमारी
— Vijay Anand Mahir















