
दुखी होने लगे जब हम ग़ज़ल कह दी
हुई आँखें मिरी जब नम ग़ज़ल कह दी
नज़र आया, लगा अपना, मुझे कोई
न बोले, आ गए घर हम ग़ज़ल कह दी
बिछड़ के जा रहा था दूर ख़ुद से मैं
तभी ऐसा बना आलम ग़ज़ल कह दी
टपकता था लबों से पानी बारिश का
बदन भीगा, हसीं मौसम ग़ज़ल कह दी
उसे मालूम हो क्या हाल मेरा है
लिखे सारे-के-सारे ग़म ग़ज़ल कह दी
क़लम ने ख़ूब फिर ता'रीफ़ की 'माहिर'
किया अच्छा जो ये हमदम ग़ज़ल कह दी
— Vijay Anand Mahir















