तभी से ऊब इक उठती है सीने में
वो बिछड़ा था इसी फागुन महीने में
डुबोएगा मुझे वो साथ अपने ही
किया है छेद उस ने अब सफ़ीने में
कटेंगे किस तरह ये सर्दियों के दिन
तू बिछड़ा है मुहब्बत के महीने में
उदासी साथ है आओ पिएँ चल के
जब ऐसा है तो क्या है हर्ज़ पीने में
— Manish Yadav















