कोई तुझ को भी है ढूँडता जोगिया

तू कहाँ खो गया सर-फिरा जोगिया

जिस की है जुस्तजू वो तो है ही नहीं
अब ये ज़िद छोड़ दे मान जा जोगिया

ज़ख़्म-ए-जाँ मुश्किलों से भरा था मिरा
तू ने क्यूँ मुझ को फिर छू लिया जोगिया

वो जो मुझ में कोई शख़्स था उस को मैं
उम्र भर याद करता रहा जोगिया

कब तलक ख़ुद से यूँ ही ख़फ़ा बैठेगा
कोई है मुंतज़िर लौट आ जोगिया

कौन समझेगा दिल का फ़साना यहाँ
रहने दे अन-कहा अन-सुना जोगिया

देख तो घर में भी अब बहार आई है
अपने अंदर से तू बाहर आ जोगिया

आज फिर उस गली जाने की ज़िद न कर
हश्र है बरपा कू-ए-जफ़ा जोगिया

ख़ुद से हारा हुआ इक मुसाफ़िर है तू
क्या ही मंज़िल है क्या रास्ता जोगिया

ये मदीने के उस कूचे की ख़ाक है
और मल तन को ख़ाक-ए-शिफ़ा जोगिया

कल तलक तो थे विर्द-ए-ज़ुबाँ ये कहो
फिर हुए क्या वो हर्फ़-ए-दुआ जोगिया

जो हुआ वो तो होना ही था एक दिन
कब तलक ख़ुद को देगा सज़ा जोगिया

दिल के सहरा में फिर गूँजती है सदा
कब कोई आएगा हम-नवा जोगिया

याद की लौ में जलता रहा उम्र भर
क्या ये लाज़िम था मरना सदा जोगिया

जिस महक को मैं सोचों मैं ढूँडा करूँ
वो महक बन गई फ़ासिला जोगिया

वो जो पागल सा शाइ'र था इक 'शहरयार'
उस की है कुछ ख़बर कुछ पता जोगिया

— MIR SHAHRYAAR

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