मैं तुझ में हूँ तू मुझ में है हम में कुछ भी नहीं
किसी ग़म में दोनों हैं पर ग़म में कुछ भी नहीं
है ये सब फ़साना अदम का फ़साना कोई
कि आदम हवा में है आदम में कुछ भी नहीं
अजब हाल है ज़ेहन की ख़स्ता दीवार का
कि यादों का एल्बम है एल्बम में कुछ भी नहीं
ये दश्त-ए-हवैदा है यूँ ख़म-ब-ख़म तह-ब-तह
ख़ुदी दम-ब-दम है मगर दम में कुछ भी नहीं
कहाँ ढूँढ़ के लाऊँ वो चेहरे जो खो गए
नज़र में तो झेलम है झेलम में कुछ भी नहीं
ये दिल बे-सबब बे-ख़बर यूँही मरता रहा
हक़ीक़त में अफ़साना-ए-ग़म में कुछ भी नहीं
— MIR SHAHRYAAR















