तू मेरे सामने क्यूँँ नहीं आता
कि दिल को भी मेरे कुछ यक़ीं आता
दरख़्शाँ होते सारे गली कूचे
कभी इस शहर वो मह-जबीं आता
गँवा दी हाए क्यूँ ज़िंदगी तू ने
मैं गर वापस भी आता यहीं आता
मैं क़दमों के निशाँ छोड़ आया हूँ
तुझे मुझ पर यक़ीं गर नहीं आता
मकाँ कब से सजा के रखा है काश
कभी वो इस मकाँ का मकीं आता
मैं कह भी देता दिल की वो बातें पर
तुझे मुझ पे यक़ीं तो नहीं आता
— MIR SHAHRYAAR















