तिरे इस चाँद से माथे से फिसला माँग-टीकातिरे लब को न छू पाई कभी, वो लाली हूँ मैंतिरी पाज़ेब से टूटा हुआ बद-बख़्त घुँघरूतिरे ही कान की खोई हुई इक बाली हूँ मैं— Mohit Subran