दर्द मिलता है हमेशा ही ख़ुशी के साथ में
नौकरी करनी पड़े है शा'इरी के साथ में
औरतों ने रो रुला कर दिल को हल्का कर लिया
मसअला हरदम रहा है आदमी के साथ में
उस से मिलना है बिछड़ना भी है लेकिन सेम डे
मौत हम को दे रहा है ज़िंदगी के साथ में
जा-ब-जा जिस ने मेरी दस्तार को मैला किया
आज बैठा है मेरा कुनबा उसी के साथ में
उन को अपना काम करना था सो वो करते रहे
और हम सहते रहे सब ख़ामुशी के साथ में
बद-दुआ लोगों ने दी थी डूब मरने की हमें
इश्क़ भी हम को हुआ तो जलपरी के साथ में
— Mukesh Guniwal "MAhir"















