वो कोई काम रग़बत से नहीं करते
मुहब्बत भी मुहब्बत से नहीं करते
ख़ुदा की ओर है हम को कशिश इतनी
शग़फ़ लेकिन इबादत से नहीं करते
सँवारे या बिगाड़े है वो कर्मों से
तवक़्क़ो कोई मन्नत से नहीं करते
अयाँ करते हैं वो दाइम इशारों में
फ़क़त ज़ाहिर वज़ाहत से नहीं करते
यहाँ सोज़-ए-दरूँ के हैं जो सोज़िश-दार
ज़रा दहशत क़ियामत से नहीं करते
— Muntazir shrey















