“मुंतज़िर”
हम चाहते हैं यूँ जिन्हें उन की हमें
बस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि सच वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है
हम कब भला उन को नज़र में भर सके
थी देखने की ख़्वाह उन को जो रही
यूँ जो कभी मिलता हमारा रहगुज़र
थी चाह उन को देख लेते इक नज़र
कोई न थी उम्मीद पर जीते रहे
बस उम्र भर तस्वीर उन की देख कर
महरूम हम दाइम रहे उस लम्स से
हम से मुख़ातिब हो सके वो पल नहीं
हम ज़ुल्फ़ को उन की सँवारें भी कभी
मुद्दत हुई दिल में बस इक ये ख़्वाह है
हम चाहते हैं यूँ जिन्हें उन की हमें
बस उम्र भर की ख़ैरियत की चाह है
जैसे कि बस वो लौट आएँगे कभी
दीदा-ओ-दिल इस तौर फ़र्श-ए-राह है















