महकते से लम्हों की महफ़िल सजी हो
निगाहों में उल्फ़त की इक रौशनी हो
जहाँ लब ये चुप हों नज़र कह रही हो
वहाँ भी तसव्वुर में कुछ ज़िंदगी हो
वो रस्ते वो बातें वो माज़ी के क़िस्से
यहाँ हर तरफ़ हर ज़बाँ शा'इरी हो
कभी जो हँसी में छुपा दर्द पाएँ
वही तो हमारे दिलों की ख़ुशी हो
रहे साथ जब तक ये साँसें हमारी
तेरी दोस्ती ही मेरी बंदगी हो
— Vikas Shah musafir















