तअल्लुक़ का फ़साना कुछ अजब है
न उलझा है न सुलझा फिर भी सब है
मैं ख़ुद को छोड़ आया हूँ वहीं पर
जहाँ तू है जहाँ तेरी तलब है
न था मेरा न तेरा कुछ भी इस में
मगर जो दरमियाँ था बस वो रब है
जिसे देखा नहीं हम ने कभी भी
वो चेहरा ख़्वाब में रहता अजब है
हमारी ख़ामुशी में शोर कब था
मगर तू सुन न पाया ये ग़ज़ब है
— Vikas Shah musafir















