उजालों की बहुत ही बद ये हालत है
तिमिर से ये मिली लगती इबारत है
मिटा नइँ पाएगी इस को ये बारिश भी
ग़रीबी के लहू में जो नफ़ासत है
ज़मीं पर झुक चुके हैं पेड़ पौधे भी
फ़लक के पास कैसी ये रियासत है
चराग़ाँ बुझ गए हैं ख़्वाब जलने तक
लगे है रात जैसे इक सियासत है
मुक़द्दर क्या दिलों की ख़ैरियत पूछो
ग़रीबों के दिलों में जो सख़ावत है
ज़माना छीन लेगा सब अमानत ये
हवाओं में घुली ऐसी बग़ावत है
— Vikas Shah musafir















