“ग़म”
जाँ तुम्हें दिल से ऐसे भुलाने लगे
जाम पीने लगे और पिलाने लगे
मय को देखा नहीं था कभी इक नज़र
अब तो शाम-ओ सहर डगमगाने लगे
तुम जुदा जो हुए ज़िंदगी से मिरी
साँस सिगरेट ने कुछ मिरी छीन ली
ये धुआँ बन गया फिर मिरी ज़िंदगी
दम लगाने लगे ग़म मिटाने लगे
मैं था उम्दा कभी मैं था सच्चा कभी
लोग कहते हैं ये मैं था अच्छा कभी
एक तुम ने मुझे जब बुरा कह दिया
फिर बुरा मुझ को सारे बताने लगे
है सताया जो तुम ने मुझे इस क़दर
फिर न रहमत की कोई पड़ी इक नज़र
सबने पागल कहा मुझ को पागल किया
मुझ को मेरे सभी अब सताने लगे
लोग आते हैं बस दिल दुखाते हैं बस
मुझ को दिन-रात ग़म अब सताते हैं बस
अब तो हर ग़म से नाज़िम मिलेगा सुकून
छोड़ कर अब लो दुनिया को जाने लगे















