गुलों का रंग न वो चाँदनी का साया था

हमारे ख़्वाब में कल रात तू ही आया था

वो ख़ुशबुओं की तरह आ के बस गया मुझ
में
वो एक शख़्स जो कल तक बहुत पराया था

अब उस की शाख़ पे आए हैं फूल नूरानी
ज़मीं पे दिल की जो दुख का शजर लगाया था

वफ़ा के क़त्ल पे जब तीरगी उतारू थी
जुनूँ ने ख़ून से अपने दिया जलाया था

अभी भी दश्त की वीरानियों में रहता है
हुई थी जिस को मुहब्बत, जो मुस्कुराया था

उसी में हम भी थे तुम भी थे इश्क़ भी तो था
वो एक क़िस्सा जो हम ने तुम्हें सुनाया था

नदीम जानू पे सर रख के सो रही है क़ज़ा
कहाँ ये जाती इसे मैं ने ही बुलाया था

— Nirmal Nadeem

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