मदिरा-पान किया लेकिन आराम नहीं आया
आख़िर ये नुस्ख़ा भी मेरे काम नहीं आया
इतनी सफ़ाई से वो तोड़ गया है मेरा दिल
धोके-बाज़ों में भी उस का नाम नहीं आया
इश्क़ में मुझ पर हराम था देवदास बनना भी
जब तक मेरे हाथों में भी जाम नहीं आया
वो जो मेरे ज़ख़्मों पर मरहम जैसा था ना
उस के बा'द मुझे ता-उम्र आराम नहीं आया
पंखा रस्सी सब था मेरी लाश भी थी और ख़त
सब ज़ाहिर था पर उस पर इल्ज़ाम नहीं आया
मैं उस मोड़ पर अब भी साकिन हूँ जिस मोड़ पे वो
मुझ से मिलने 'मिलन' गुज़श्ता शाम नहीं आया
— Milan Gautam















