पूरी पद्मावत है उस के चेहरे में
मैं भी मलिक बना रहता हूँ सपने में
मैं ही एक बग़ावत करने वाला हूँ
सब अहल-ए-दस्तूर-ए-कुहन हैं कुंबे में
इश्क़ में मरता है पर देख नहीं पाते
माता-पिता तबद्दुल अपने बेटे में
इक तो मुझ को गाँठ लगाना नहीं आता
और फिर ताक़त नहीं है छत के पंखे में
सच्चे प्यार में धोका और फिर सुख़न-वरी
ज़्यादा देर नहीं लगती है मरने में
माह-ओ-साल नहीं होती है बात उस से
होश नहीं रहता है उस को ग़ुस्से में
भर लो अपनी माँग सुहागन हो जाओ
भेजा है सिंदूर तुम्हारे तोहफ़े में
वो भी तो कर सकता था आराम मगर
कुछ तो बात रही होगी उस कछुवे में
हर इक को उस की हीर नहीं मिलती वर्ना
इक राँझा होता ही है हर लड़के में
कंकड़ डाल बुझाई अपनी प्यास 'मिलन'
कितनी तड़प रही होगी उस कौवे में















