धुएँ में उड़ गईं साँसे सिगार ख़त्म हुआ
इसी के साथ तेरा इंतिज़ार ख़त्म हुआ
बदन से कर के अलग रूह को जहाँ वाले
ये सोच लेते है दुनिया से प्यार ख़त्म हुआ
तुम्हारा हुस्न भी फीका पड़ा ए माह-जबीं
मेरा भी आशिक़ों में अब शुमार ख़त्म हुआ
किसी ने होंठों पे रख दी हैं उँगलियाँ अपनी
अब इस से आगे मेरा इख़्तियार ख़त्म हुआ
— Om awasthi















