तवील इश्क़ की चाहत थी मुख़्तसर न मिला

हमारे जैसों को ये तोहफ़ा उम्र भर न मिला

तमाम उम्र उलझता रहा मैं दुनिया से
समझ सके जो मुझे ,ऐसा हम-नज़र न मिला

ये सोचता हूँ के, क्या ही बिगाड़ लूँगा तेरा
तू इस दफ़ा भी मुझे वक़्त पर अगर न मिला

उदासियाँ हैं फ़क़त अर्ज़-ए-दिल में फैली हुई
वो शाख़ हूँ मैं जिसे ,कोई भी समर न मिला

किसी के दिल में मुकम्मल क़याम करने को
कोई भी नुस्ख़ा मुहब्बत से कार-गर न मिला

— Om awasthi

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