आख़िर ये रोज़ रोज़ की, वहशत निकल गई
इक दिन हमारे दिल से, मोहब्बत निकल गई
दुनिया के ताम-झाम में ,उलझा था इस कदर
जो चार दिन थी जीने की ,मोहलत निकल गई
भरते थे ज़ख़्म छूने से ,अहल-ए-वफ़ा थे जब
हाथों से उनके अब ये, महारत निकल गई
सोज़-ए-हयात में भी, मोहब्बत की इक गली
एहसान है जो तेरी, बदौलत निकल गई
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