दिलों के दरमियाँ जिस वक़्त ये ज़माना पड़ा

दयार-ए-इश्क से बाहर निकल के आना पड़ा

किसी को हक़ था जहाँ चाहे रास्ता बदले
किसी को उम्र तलक राब्ता निभाना पड़ा

पसीना हम ने बहाएा न जंग से पहले
तभी तो हम को लहू जंग में बहाना पड़ा

कोई समझता मेरे दिल की कैफ़ियत उस पल
तुम्हारा अक्स रह-ए-दिल से जब मिटाना पड़ा

किसे ख़बर की सुकूँ की तलाश में हम को
हयात-ए-फ़ानी में कितनो से दिल लगाना पड़ा

— Om awasthi

More by Om awasthi

Other ghazal from the same pen

See all from Om awasthi →

Child Labour Shayari

Shers of child labour.

All Child Labour Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling