दिलों के दरमियाँ जिस वक़्त ये ज़माना पड़ा
दयार-ए-इश्क से बाहर निकल के आना पड़ा
किसी को हक़ था जहाँ चाहे रास्ता बदले
किसी को 'उम्र तलक राब्ता निभाना पड़ा
पसीना हमने बहाएा न जंग से पहले
तभी तो हमको लहू जंग में बहाना पड़ा
कोई समझता मेरे दिल की कैफ़ियत उस पल
तुम्हारा अक्स रह-ए-दिल से जब मिटाना पड़ा
किसे ख़बर की सुकूँ की तलाश में हमको
हयात-ए-फ़ानी में कितनो से दिल लगाना पड़ा
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