मैं ने सोचा ही नहीं दिल से निकालूँगा इन्हें
तेरी यादें हैं, मैं ता-उम्र सँभालूँगा इन्हें
बन के दरिया जो निगल लीं तेरी कड़वी बातें
वक़्त आने पे तेरी ओर उछालूँगा इन्हें
देखते हैं बड़ी हसरत से परिंदे मुझ को
जैसे हर बार असीरी से बचा लूँगा इन्हें
तू अगर ज़िक्र-ए-मोहब्बत पे भी ख़ामोश रहा
जो ये जज़्बात हैं सीने में दबा लूँगा इन्हें
— Om awasthi















