आसमाँ को चूम कर आया ज़मीं पर
जीत आया मैं जहाँ तेरे यक़ीं पर
अस्लियत में मैं तुम्हारा था दिवाना
कह दिया तुम ने मुझे पागल कहीं पर
रास्ते आ कर जहाँ मिलते सभी हैं
लोग अक्सर छूट जाते हैं वहीं पर
दस्तकें दर पर तिरे देता रहा मैं
ज़िंदगी भर दर-ब-दर भटका नहीं पर
ज़ख़्म तुम ने जो दिए भरते नहीं थे
क्यूँ चलाया आज फिर ख़ंजर हमीं पर
दिल है मेरा या फ़क़त शीशा है कोई
जो भी चाहे तोड़ देता है कहीं पर
— Prashant Prakhar















