कई तूफ़ाँ उठे इक साथ सीने में
मगर तब मस्त था मैं दर्द पीने में
न तौलो तुम मुझे अपने तराज़ू में
बहुत है फ़र्क पत्थर में नगीने में
मुझे ले कर चलो अब दूर दुनिया से
मज़ा आता नहीं अब घुट के जीने में
हुआ यूँ ही नहीं पागल मैं दीवाना
बहुत हैं दर्द यारों दफ़्न सीने में
कोई भूखा न सोए इस लिए दहकाँ
जुटा था काम में लतपथ पसीने में
यही इक बात वालिद को सताती है
गुज़ारा कैसे होगा इस महीने में
— Prashant Prakhar















